सोमवार, 20 जुलाई 2026
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026
चिरोयली कहानी
चिरोयली
मैं ताशकंद, उज़्बेकिस्तान में सन 2024 की फ़रवरी के पहले सप्ताह में पहुंचा था, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में । मुझे यहाँ लगभग डेढ़ साल का समय बिताना था । एक अजनबी देश में अकेले इतना लंबा समय बिताने का यह पहला अनुभव था । मन में कई तरह के विचार थे जो परेशान किए हुए थे। ताशकंद मेरे लिए एक नई किताब जैसा था, जिसके पृष्ठों को मुझे इन डेढ़ सालों में धीरे-धीरे पलटने थे। लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति केंद्र के निदेशक भाई सितेश कुमार ने बताया था कि ड्राइवर शाहरुख मुझे एयरपोर्ट पर मिलेंगे और उन्हें अंग्रेज़ी बोलने आती है। अपना सामान लेकर जैसे ही मैं एयरपोर्ट से बाहर निकला ठंडी हवा के तेज़ झोके से मेरी रूह कांप गयी । अभी ओवर कोट पहन ही रहा था कि एक लंबे चौड़े व्यक्ति ने मुझसे पूछा " प्रोफ़ेसर मनीष फ़ॉर्म इंडिया ?" मैंने हां में सिर हिलाते हुए कहा " यस,बट हाऊ यू हैव रिकॉग्नाइज्ड मी ?"
उसने मुस्कुराते हुए कहा," मिस्टर सितेश कुमार हैज गिवेन मी योर फ़ोटो। कैन वी गो?" इतना कहकर उन्होंने समान की ट्राली पकड़ ली और मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया। मैं पहली बार किसी अजनबी देश की मिट्टी पर उतरा था। कदमों के नीचे की बर्फ़ चरमरा रही थी, जैसे कोई अनकही भाषा स्वागत कर रही हो। शाहरुख ने सामान कार में रखा और हम मेरे नए आशियाने की तरफ़ निकल पड़े । वह आशियाना जिसे मैं खुद पहली बार देखनेवाला था । इस नए परिंदे के लिए ताशकंद में आशियाना और आबोदाना सुनिश्चित थे,बस आगाज़ और अंज़ाम बाकी था ।
बाहर हल्की बर्फ़ गिर रही थी, नर्म रुई की फ़ाहों की तरह । गिरती हुई बर्फ़ कई बार शिमला में देख चुका था लेकिन वो मौसम किसी के संग-साथ वाला था । लेकिन यहाँ मैं अकेला था । संग-साथ की स्मृतियाँ और वर्तमान की निःसंगता के बीच कार धीरे-धीरे मेरे नए आशियाने यक्का चिनार, मीराबाद की ओर बढ़ रही थी । ऐसा लग रहा था कि समय के धूसर पल धीरे-धीरे मेरे भीतर उतर रहे हों। कार के अंदर की ऊष्मा और बाहर की ठंड के बीच मैं फँसा हुआ था, जैसे स्मृतियों और वर्तमान के बीच कोई अदृश्य दरार थोड़ी और चौड़ी हो गई हो। वह पूरा शहर जैसे बर्फ़ की चादर में लिपटा हुआ था। दूर-दूर तक सफ़ेद परतें, जैसे किसी ने धरती को नए सिरे से रंग दिया हो । इस धरती के हर पत्थर, हर पेड़, हर बर्फ़ के कण को मुझे अब धीरे-धीरे पहचानना था, आख़िर कितने दिन अजनबी रहूंगा ? ताशकंद की वह ढलती हुई साँझ चुपचाप बर्फ़ में लिपटी थी। और मैं, उसकी बाहों में एक नए सफ़र की शुरुआत करने जा रहा था।
अभी कोई पाँच, साढ़े पाँच ही बजे थे पर शहर जैसे सोया हुआ था। सड़कें शांत थीं, पर मुझे महसूस हो रहा था कि यह नींद अस्थायी है। यह शहर सुबह होते ही अपना सुर्ख़ चेहरा दिखाएगा, और मैं उसकी आँखों में झाँक सकूँगा। एयरपोर्ट से यक्का सराय की दूरी मुश्किल से 20 मिनट की रही होगी । अली शेर नवाई पार्क की परिक्रमा कर के हम अपने गंतव्य पर पहुँचते हैं और शाहरुख कार रोक देता है। वह इमारत, जहाँ मुझे ठहरना था, वह नौ मंजिला इमारत अब मेरे सामने थी। चारों ओर बर्फ़ की चादर, और बीच में पीली रोशनी से जगमगाता लोहे का मुख्य दरवाज़ा। दरवाजा नंबर कोड से शाहरुख ने खोला और हम लिफ्ट से नौवीं मंज़िल के 65 नंबर फ्लैट के सामने आ गए । फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर शाहरुख ने सामान एक तरफ़ रखा और मुझे फ्लैट दिखाने लगा ।
पानी कैसे आयेगा, गैस कैसे चालू होगी, दरवाज़ा बंद कैसे होगा, रूम हीटिंग, मुख्य दरवाजे का कोड, वाईफाई कोड इत्यादि । मैंने सब कुछ ध्यान से सुना। एक-एक बात मानो जीवन की डोर से बँधी हुई थी। नए देश में रहना केवल भाषा और लोगों से परिचित होना नहीं होता, बल्कि हर छोटे यंत्र, हर साधन, हर कोड को समझना भी ज़रूरी हो जाता है। यही वे सूत्र होते हैं जो किसी अनजान घर को ‘अपना’ बनाने की ओर पहला कदम होते हैं । अपार्टमेंट के नीचे ही ‘फिश लैंड’ और ‘जाहिद कबाब’ नाम के दो होटल थे । ‘स्मार्ट सेंटर’ नाम की एक बड़ी दुकान भी जहां सब्जियां, फल, दूध और किराने का लगभग सब सामान मिल जाता था। मेडिकल स्टोर, कॉस्मेटिक, चौबीस घंटे खुली रहनेवाली दो वाइन शॉप, हॉस्पिटल और अली शेर नवाई पार्क भी पास ही था । नया आशियाना मुझे पसंद आया। मुझे ज़रूरी सारी बातें नोट करा और मोबाइल के लिए यूसेल नामक कंपनी का नया उज़्बेकी सिम्कार्ड देकर, शाहरुख रूखसत हुए ।
शाहरुख के जाने के बाद उस फ्लैट में एक गहरी चुप्पी फैल गई। फ्लैट मानो अचानक अपनी साँस रोककर खामोश हो गया हो । मैं अकेला था, बर्फ़ के शहर में, एक नए घर में, अनजान दीवारों के बीच। उस चुप्पी और उस घर को अब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बनना था। बाहर बर्फ़ अब भी गिर रही थी, पर भीतर का कमरा धीरे-धीरे गर्म हो रहा था। सेंट्रल हीटिंग की बहुत हल्की-सी गुनगुनाहट मुझे यह एहसास दिला रही थी कि अब मैं सुरक्षित हूँ। तभी याद आया कि रात के खाने का क्या ? शाम के सवा छ ही तो हुए थे फ़िर बाहर ही तो होटल था, पर भीतर एक झिझक थी । क्या अभी बाहर जाना चाहिए? क्या मैं राह भटक जाऊँगा? भाषा न समझ पाने पर क्या होगा? उज़्बेकी के कुछ शब्द सीखे थे लेकिन क्या उनसे काम बन जाएगा ? थोड़ा विचार करने के बाद मैंने धीरे से कोट उठाया, दस्ताने चढ़ाए और दरवाज़े का कोड दोहराया, ताकि लौटते वक्त भूल न जाऊँ। पहले ही दिन अधिक रात को बाहर जाने से अभी चले जाना मुझे उचित निर्णय लगा ।
‘फिश लैंड” होटल पहुँचकर भीतर मैं एक मेज़ पर बैठा, थोड़ी-सी थकान, थोड़ी-सी भूख और अजनबीपन की मिलीजुली बेचैनी के साथ। मेनू उज़्बेकी के साथ अंग्रेजी में भी उपलब्ध था । उस होटल में एक ग्रिल सैंडविच और तुर्की चाय से काम बन गया। शाकाहारी लोगों के लिए अधिक कुछ वहां था नहीं । वैसे भी परदेश में रहते हुए अपनी आदतों, अपने स्वादों को बार-बार समझौते की आग में झोंकना ही पड़ता है। लगभग एक लाख सोम का बिल चुका मैं वहां से चलता बना । खाने का इतना बड़ा बिल चुकाकर हंसी आ रही थी। वहां एक भारतीय रुपया लगभग डेढ़ सौ उज़्बेकी सोम के बराबर था। वहाँ पैसे का भारतीय मुद्रा में हिसाब का मेरा फार्मूला था कि आप सोम में जितना भुगतान करें उसमें से दो शून्य पहले निकाल दीजिये । जैसे एक लाख सोम में से दो शून्य निकालने के बाद होंगे एक हजार फ़िर जो बचे उसमें से भी तीस प्रतिशत कम कर दीजिये । अब जो राशि हुई वह लगभग वह भारतीय रुपए के बराबर होगी । इस हिसाब से मैंने लगभग सात सौ रुपये खर्च किए थे ।
वहां से अपार्टमेंट वापस आने के लिए अली शेर नवाई पार्क की बाहरी सड़क से आना होता था , जिसके बायीं तरफ़ पुरानी किताबों की दर्जनों दुकाने थीं । वहां अधिकांश किताबें उज़्बेकी और रूसी में ही थीं, पर आदतन किताबें देखकर रुक गया । सजी हुईं वे किताबें किसी बर्फ़ीले बियाबान में खिले फूलों जैसी लगीं, सुंदर पर समझी न जा सकने वाली । उस समय यह यक़ीन हो गया कि भाषा ज्ञान से अधिक संपर्क की चीज़ है । किसी अक्षर को समझना, उसकी धड़कन को छू लेने जैसा है। फ़िर वह अक्षर केवल भाषा नहीं, बल्कि मनुष्य, संस्कृति और स्मृति का भी प्रतीक बन जाता है। अक्षर का धड़कन होना यह बताता है कि भाषा वाक प्रतीकों या निर्जीव चिह्नों की शृंखला भर नहीं, बल्कि एक जीवित प्राणी की तरह है,जिसके भीतर संवेदनाएँ बहती हैं जो हमें अनकही निकटताओं से जोड़ देती है। ठंड बढ़ रही थी तो मैं ने भी आगे बढ़ना ठीक समझा । सेंट्रल पैलेस होटल से बायी तरफ़ मुड़कर मैं सीधे स्मार्ट सेंटर नामक दुकान में दाखिल हुआ । शेल्फ़ पर सजी बोतलों और पैकेटों के बीच मैं ऐसे घूम रहा था, जैसे किसी अनजान भाषा की किताब पढ़ रहा हूँ । सारी चीजें उज़्बेकी या रूसी में लिखी थीं। फ़िर भी दूध, ब्रेड, कुछ फल और पानी का ज़ार लेने में मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई । वैसे भी उज़्बेक संस्कृति में आत्मीय भाव से मिलना, सहायता के लिए तत्पर रहना जैसी बातें सहज थीं । अंततः मैं सारा सामान लेकर फ़्लैट पर वापस आ गया, बिना किसी परेशानी के फ़्लैट पर पहुंच कर लगा जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत कर लौटा हूं।
यात्रा की थकान तो थी लेकिन आंखों में नींद नहीं थी । बंद कांच की खिड़की से ‘ताशकंद सिटी’ की नीली ईमारत ऐसे जगमगा रही थी मानो बर्फ़ की इस विशाल निस्तब्धता में वह अकेली सांस ले रही हो । बर्फबारी बंद हो चुकी थी लेकिन उसके आगोश में सारा शहर था । किसी तरह का कहीं कोई शोर नहीं, बस बर्फ़ और पसरी हुई शांति चारों तरफ। उस मौन में फ्लैट के भीतर चुपचाप लेटे हुए मैं अपने भीतर की धड़कन सुन पा रहा था। शायद उसी धड़कन की लय पर, जाने कब, आँखें धीरे-धीरे बोझिल हुईं और नींद एक अनकहे सपने की तरह उतर आई। सुबह 6 बजे का अलार्म बजा तो नींद खुली । मैं उठकर खिड़की के पास गया और परदे को सरकाया। सामने का दृश्य देखकर मन जैसे ठिठक गया । पूरा शहर बर्फ़ से ढका हुआ था। पेड़-पौधे, सड़कें, छतें सब पर सफ़ेद चादर बिछी हुई। धूप अभी पूरी तरह निकली नहीं थी, लेकिन आसमान पर की हल्की गुलाबी और सुनहरी किरणें नीचे बर्फ़ को चमका रही थीं। कमरे के भीतर तो गर्माहट थी, लेकिन खिड़की खोलते ही ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया और चेहरे को छू गया। उस स्पर्श में ठंडक तो थी, मगर साथ ही एक ताजगी भी।
उस क्षण मुझे ख़्याल आया कि आख़िर ऐसे मौसम में कोई काम पर कैसे जाता होगा ? ये कोई काम पर जाने का मौसम है ? फिर याद आया कि मुझे भी नौ बजे विश्वविद्यालय पहुंचना है जो कि मेरे अपार्टमेंट के करीब ही था, कोई एक या डेढ़ किलोमीटर की दूरी थी । अतः मैं तैयार होकर साढ़े आठ तक अपार्टमेंट के नीचे आ गया। अपार्टमेंट के मुख्य गेट से बाहर निकलते ही बर्फ़ की ठंडी हवा चेहरे से टकरायी, ऐसा लगा कि यह शहर अपने मौन और श्वेत विस्तार से मेरा स्वागत कर रहा है।आज पहला दिन था ऊपर से बर्फ़, इसीलिए पैदल जाने की बजाय यनडेक्स से कैब बुला ली । यनडेक्स ताशकंद में वैसी ही सेवा है जैसी भारत में ओला या उबर की है । अभी तीन चार मिनट ही बीते थे कि एक सुंदर सी चमचमाती हुई काले रंग की कार मेरे पास आकर रुकी । मैंने कार का नंबर देख कंफर्म किया कि वो मेरे लिए ही आयी थी ।
मैंने आदतन आगे की ओर बायीं तरफ़ का दरवाज़ा खोला तो दंग रह गया। वह ड्राइवर सीट थी और उस पर सत्ताईस-अट्ठाईस साल की सुंदर सम्भ्रांत उज़्बेकी लड़की बैठी हुई थी। क्षणभर को लगा कि शायद मैंने किसी की निजी कार का दरवाज़ा खोल दिया है । लेकिन फ़िर ध्यान आ गया कि उज्बेकिस्तान में गाड़ियाँ दायीं ओर चलती हैं इसलिए यहाँ ड्राइवर की सीट बायीं तरफ होती है। हल्के से झेंपते हुए मैंने चुपचाप पीछे वाली सीट का दरवाज़ा खोला और बैठ गया। मुझे देखकर वह उज़्बेकी सुंदरी हल्के से मुस्कुराई। उसकी मुस्कान वैसी थी जैसे बर्फ़ से ढकी शाख़ों के बीच अचानक धूप का एक टुकड़ा उतर आया हो। उसकी कत्थई आँखें गहरी और चमकती हुईं । नाक नक्श एकदम तराशे हुए । उसके गालों पर हल्की लाली थी, गोया गुलाब की पंखुड़ियों ने उसे अपना रंग उधार दे दिया हो। वह सुंदर युवती मुझे इस अजनबी देश की जीवंत प्रतीक सी लगी । संस्कृति और इतिहास की तरह सम्मोहक, और वर्तमान की तरह सहज। अतः इतिहास के ख़ून खराबे से सीख़ लेते हुए मैंने भी वर्तमान में सहज़ रहना ही ठीक समझा ।
सोच ही नहीं सकता था कि ताशकंद में कैब ड्राइवर ऐसे भी हो सकते हैं । भारत में ओला-उबर वाले ड्राइवर प्रायः ‘भैया’ या ‘चचा’ ही मिलते हैं। और यहाँ ताशकंद में सुबह-सुबह ही बर्फ़ की सफ़ेदी के बीच एक परी जैसी ड्राइवर मिल गई। लगता है, ये शहर मुझे कुछ ज़्यादा ही पसंद आयेगा। जैसे ही कार चली, मैं सोच ही रहा था कि अब क्या बात करूँ? कुछ कहूँ या बस चुपचाप खिड़की से बाहर देखता रहूँ? लेकिन उसकी आँखों में वो चमक थी कि चुप्पी बोझिल हो जाती। इसके पहले मैं कुछ बोलता उसके ओंठो से शब्द फूट पड़े। उसने पूछा," हिंदुस्तान ?" मैंने कहा,"यस, हिंदुस्तान । फ़्रोम मुंबई।" मुंबई का नाम सुनते ही वो बच्चों की तरह चहक गई और बोली," शाहरुख खान, सलमान खान, अमिताभ बच्चन, प्रीती ज़िंटा!!" उसके मुस्कुराते हुए चेहरे पर वो खुशी, वो बचपना देख बहुत अच्छा लगा। लगा जैसे कि उसकी आँखों में बॉलीवुड की रंगीनियाँ चमक रही थीं, और होंठों पर कोई हिन्दी गीत बस सजने ही वाला हो। इतने में उसने "कुछ कुछ होता है" गाना बजाते हुए फ़िर पूछा," यू लाईक इट ?" मैंने कहा," यस, थैंक्स ।" ज़बाब में उसने रहमत कहा और गाड़ी धीरे धीरे बढ़ाती रही ।
मकतब 110 के पास ट्रैफिक अधिक थी सो गाड़ी वहाँ देर तक रोकनी पड़ी । जीवन में पहली बार ट्रैफ़िक में गाड़ी रुकी रहने पर कोई खीझ नहीं बल्कि प्रसन्नता का अनुभव हो रहा था । जैसे ठहराव भी अपने भीतर कोई संगीत रखता हो। उस समय बाहर बर्फ़ की सफ़ेदी थी, भीतर संवाद की हल्की-सी गरमी। बाहर रुकावट थी, भीतर प्रवाह ।यह भी समझ आया कि सारे मौसम बाहर नहीं कुछ हमारे अंदर भी होते हैं । बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए मैंने पूछा,” डू यू नो हिन्दी ?” यह सवाल केवल भाषा के ज्ञान का नहीं, बल्कि एक पुल बनाने का था, मेरे भीतर और उसकी दुनिया के बीच। थोड़ा रुककर उसने ज़वाब दिया,” नो, उज़्बेक एंड रूसी । इंग्लिश लिटिल ।” इतना कहकर उसने फ़िर अपनी वही जादूई मुस्कान बिखेर दी। “ यू उज़्बेकी, रूसी ?” उसने मासूमियत से पूछा । “ नो, हिन्दी, इंग्लिश। उज़्बेकी लिटिल।” मैंने उसी की तरह ज़बाब दिया, और हम दोनों ही खिलखिला पड़े ।
उस हँसी से जैसे दो अलग-अलग धुनें अचानक एक संगति में बदल गईं । हमारी खिलखिलाहट ने उज़्बेक, रूसी, हिन्दी और अंग्रेज़ी की दीवारों को पार कर दिया। दो अनजाने लोग, दो अलग दुनिया, दो अलग संस्कृतियाँ, केवल कुछ शब्दों और मुस्कान के माध्यम से एक दूसरे के अनुभवों के भीतर प्रवेश कर रहे थे। बाहर ट्रैफिक और बर्फ़ की ठंडक ने जैसे समय को ठहराकर हर चीज़ को स्थिर कर दिया था। सड़कें ठंडी, शहर सुन्न, और गाड़ियाँ स्थिर थीं। पर गाड़ी के भीतर, इस हँसी के कारण समय बह रहा था, धीमा, मधुर और सुखद प्रवाह की तरह । यह हँसी बाहरी स्थिरता और भीतर की गतिशीलता के बीच एक सेतु का काम कर रही थी। मैं चाहता था कि कुछ और बोलूं ,इतने में कार फ़िर चल पड़ी ।
हम सरकारी संग्रहालय के पास पहुंचे तो मैंने अनुमान लगा लिया कि हम यूनिवर्सिटी के पास ही हैं। गूगल लोकेशन से मैंने यह सरकारी संग्रहालय देखा था । अचानक कार नीले रंग की बील्डिंग के सामने रुक गई। हम ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज के गेट पर थे । मैंने सोचा काश ! यह रास्ता थोड़ा और लंबा होता… क्योंकि उसके साथ की बातें समय की तरह नहीं, किसी गाने की धुन की तरह लग रही थीं, जिसे कोई खत्म करना न चाहे। उसके साथ का हर क्षण धड़कन की एक लय में तब्दील हो चुका था । इतने में उसने फिर पूछा," टूरिस्ट?" मैंने कहा," नो, उस्ताद । हिन्दी टिल्ली/ भाषा उस्ताद ।" मेरे इतना बोलते ही उसकी आँखें बड़ी हो गईं। जैसे किसी बंद खिड़की पर अचानक उजाले का पर्दा खींच दिया जाए। अपनी आँखें नचाते हुए उसने कहा," ओह! उस्ताद, सुपर । सी यू अगेन। रहमत, नमस्ते ।" यह उसका पहला वाक्य था जिसमें एक से अधिक शब्द थे ।
मन तो कर रहा था कि उसके साथ कुछ और बातें करूं, थोड़ा और समय बिताऊं लेकिन भाषा की समस्या थी और परदेश में पहले ही दिन कोई अनधिकृत पाठ्यक्रम पढ़ाना शुरू करना उस्ताद को सही नहीं लगा । फ़िर भी चलते चलते मैने कहा," थैंक यू । रहमत । योर गुड नेम ?" वो चिरपरिचित मुस्कान बिखेरते हुए बोली," नेम, माय नेम दिलरुह, बाय ।" यह नाम मुझे उस रहस्य का प्रतीक सा लगा, जो इंसान को उसकी सीमाओं से परे ले जाकर किसी अनजानी रोशनी तक पहुँचा देता है।
" बाय दिलरुह, यू आर चिरोयली ।" मेरे यह कहते ही उसकी मुस्कान उसके कानों तक फैल गई। उसने एक ख़ास अदा से मेरी ओर देखा, जैसे कोई रहस्य अपनी आँखों से कह रही हो, शब्दों से नहीं। उसने कहा," हुम.. चिरोयली, थैंक यू उस्ताद, रहमत ।" और उसकी कार धीरे से आगे बढ़ गई। जैसे कोई सपना धीरे-धीरे आँखों से ओझल हो जाए, पर स्मृतियों के आकाश में हमेशा चमकता रहे। या फिर किसी कविता की अंतिम पंक्ति ,जो पढ़ने के बाद भी समाप्त नहीं होती, बल्कि भीतर गूँजती रहती है। उसे हिन्दी नहीं आती थी और मुझे उज़्बेकी, सिवाय कुछ शब्दों के। थोड़ी अंग्रेजी, थोड़ी उज़्बेकी के साथ काम चल गया लेकिन उसके चेहरे पर खिली मुस्कान किसी भी भाषा से ज़्यादा स्पष्ट थी ।
दिलरुह से वह छोटी सी मुलाकात पहली और आख़िरी रही । मैं लगभग डेढ़ साल ताशकंद रहा पर वह दुबारा कभी नहीं मिली । लेकिन उसकी मुस्कान अब भी मेरे भीतर कहीं बर्फ़ की तरह जमी है । उसकी आँखों का झील-सा विस्तार हर बार स्मृति में लौट आता है । शायद जीवन की सबसे कीमती मुलाक़ातें अक्सर अधूरी होती हैं। जीवन की सबसे सुंदर अर्थात चिरोयली स्मृति के रूप में।
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
प्रभारी- हिन्दी विभाग
के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय
कल्याण पश्चिम – 421301
महाराष्ट्र ।
manishmuntazir@gmail.com
मंगलवार, 31 मार्च 2026
शनिवार, 31 जनवरी 2026
बुखारेस्ट में संपन्न क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन
बुखारेस्ट में संपन्न क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन : वैश्विक हिंदी शिक्षण की चुनौतियों और समाधानों पर केंद्रित सार्थक संवाद
बुखारेस्ट, रोमानिया | 28–29 जनवरी
रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट स्थित रोमानियन–अमेरिकन यूनिवर्सिटी के सभागार में 28–29 जनवरी को भारतीय दूतावास के तत्वावधान में एक क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया। इस सम्मेलन का उद्देश्य भारत के बाहर हिंदी शिक्षण की वास्तविक चुनौतियों, भाषा-विज्ञान से जुड़ी समस्याओं तथा उनके व्यावहारिक समाधानों पर केंद्रित संवाद स्थापित करना था।
इस आयोजन के मेज़बान भारतीय उच्चायोग, बुखारेस्ट के श्री सीतेश सिन्हा रहे। सम्मेलन में यूरोप, अमेरिका और भारत से हिंदी भाषा एवं साहित्य से जुड़े प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, अध्यापकों एवं शोधकर्ताओं ने सहभागिता की।
सम्मेलन का उद्घाटन रोमानियन–अमेरिकन यूनिवर्सिटी के रेक्टर प्रो. कोस्टेल नेग्रिसिया ने किया। उन्होंने भारत–रोमानिया सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित करते हुए रोमानिया में हिंदी को एक सशक्त और सम्मानजनक मंच प्रदान करने का आश्वासन दिया।
भारत के राजदूत महामहिम श्री मनोज कुमार महापात्र ने हिंदी शिक्षण एवं प्रशिक्षण की भावी योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए विदेश मंत्रालय का आभार व्यक्त किया, जिसने विश्वभर के हिंदी विद्वानों को एक साझा मंच प्रदान किया।
भारत से पधारीं श्रीमती अंजु रंजन (संयुक्त सचिव, विदेश मंत्रालय) ने इतने कम समय में वैश्विक स्तर के हिंदी प्रेमियों की उपस्थिति पर संतोष व्यक्त किया तथा विदेशों में हिंदी शिक्षण को सुदृढ़ बनाने हेतु मंत्रालय की प्रतिबद्धता दोहराई।
इस सम्मेलन में स्वीडन, डेनमार्क, नीदरलैंड, यू.के., जर्मनी, बुल्गारिया, स्पेन, आर्मेनिया, पोलैंड, तुर्की, हंगरी, रोमानिया, मोल्दोवा, क्रोएशिया, कज़ाख़स्तान, अमेरिका, सर्बिया तथा भारत से कुल 20 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया
गुरुवार, 25 दिसंबर 2025
अमरकांत जन्मशती पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद
कथाकार अमरकांत जन्मशती पर राष्ट्रीय परिसंवाद
महाराष्ट्र शासन के सांस्कृतिक कार्य विभाग के अंतर्गत महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), नई दिल्ली तथा के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम) के हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया जा रहा है।
यह परिसंवाद 16 एवं 17 जनवरी 2026 को के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम) में सम्पन्न होगा। परिसंवाद का विषय “निम्न मध्यमवर्गीय भारतीय समाज और अमरकांत का साहित्य” है, जो वरिष्ठ साहित्यकार अमरकांत जी के जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा है।
परिसंवाद का उद्देश्य अमरकांत के कथा-साहित्य, उनके सामाजिक यथार्थ-बोध, निम्न मध्यमवर्गीय जीवन की संघर्षशील चेतना, नैतिक द्वंद्व, मानवीय मूल्य और समकालीन भारतीय समाज की जटिलताओं का अकादमिक विश्लेषण करना है। देश भर से आमंत्रित हिंदी साहित्य के वरिष्ठ विद्वान, शोधकर्ता, प्राध्यापक और युवा शोधार्थी इस राष्ट्रीय परिसंवाद में सहभाग करेंगे।
इस अवसर पर साहित्य, समाजशास्त्र और सांस्कृतिक अध्ययन के विविध आयामों पर विचार-विमर्श, शोध-पत्र वाचन तथा संवाद सत्र आयोजित किए जाएंगे। आयोजकों का मानना है कि यह परिसंवाद अमरकांत के साहित्य को समकालीन सामाजिक संदर्भों में पुनः समझने और नई पीढ़ी तक उनकी रचनात्मक चेतना पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
रविवार, 21 सितंबर 2025
मध्य एशिया : साहित्यिक, सांस्कृतिक परिदृश्य और हिन्दी विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद सम्पन्न ।
प्रेस रिपोर्ट
मध्य एशिया : साहित्यिक, सांस्कृतिक परिदृश्य और हिन्दी विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद सम्पन्न ।
कल्याण (महाराष्ट्र), 22 सितम्बर 2025।
के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण तथा इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सेंट्रल एशियन स्ट्डीज (समरकंद, उज्बेकिस्तान) एवं अल्फ़रांगस यूनिवर्सिटी, ताशकंद के संयुक्त तत्वावधान में 20–21 सितम्बर 2025 को “मध्य एशिया : साहित्यिक, सांस्कृतिक परिदृश्य और हिन्दी” विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन परिसंवाद सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। जूम प्लेटफॉर्म पर आयोजित इस परिसंवाद में भारत, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस सहित विभिन्न देशों से 80 से अधिक विद्वानों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने भाग लेकर अपने विचार एवं शोध प्रस्तुत किए।
उद्घाटन सत्र का संचालन परिसंवाद संयोजक डॉ. मनीष कुमार मिश्रा (सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय) ने किया। स्वागत भाषण श्री एवरन रुतबिल (निदेशक, IICAS, समरकंद) ने दिया। प्राचार्य डॉ. अनीता मन्ना ने संस्थान की ओर से संदेश दिया। बीजवक्ता प्रो. (डॉ.) रवीन्द्र सिंह (दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय) रहे। विशिष्ट अतिथियों में प्रो. (डॉ.) रामकांत द्विवेदी (MERI, नई दिल्ली) और वरिष्ठ इन्डोलॉजिस्ट श्री रहमतव बायोत (ताशकंद विश्वविद्यालय) शामिल थे। आभार प्रदर्शन डॉ. पुलातोव शेरदोर नेमत्ज़ोनोविच (अल्फ़रांगस विश्वविद्यालय) ने किया।
परिसंवाद में कुल पांच तकनीकी सत्र आयोजित हुए, जिनमें हिन्दी साहित्य और मध्य एशिया की परंपराओं, सूफ़ी और बौद्ध साहित्य, भारतीय स्थापत्य, संगीत एवं नृत्य, बॉलीवुड और सांस्कृतिक कूटनीति जैसे विविध विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
प्रमुख वक्ताओं में प्रो. नोज़िम गफ्फारोविच, डॉ. सुशांत कुमार दुबे, सोनिया राठौर, डॉ. सत्यवान माने, डॉ. रूपेश दुबे, गुलज़बीन अख़्तर अंसारी, डॉ. नवीन कुमार, मंजना कुमारी, प्रो. वंदना पुनिया, डॉ. रीता मिश्रा, डॉ. वैशाली पाटिल, डॉ. किरण चव्हाण, डॉ. अनुराधा शुक्ला, डॉ. उषा आलोक दुबे, डॉ. रीना सिंह, कमोला अहमदोवा, डॉ. कल्पना, डॉ. सुनीता क्षीरसागर, डॉ. हर्षा त्रिवेदी, डॉ. नवल पाल प्रभाकर दिनकर आदि विद्वानों के नाम उल्लेखनीय रहे।
21 सितम्बर को आयोजित समापन सत्र में विशिष्ट अतिथि सुश्री कमाक्षी वासन (ग्लोबल COO एवं एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, टिलोट्टोमा फाउंडेशन) ने संबोधित किया। विभिन्न देशों के प्रतिभागियों ने अपनी प्रतिक्रियाओं में इस परिसंवाद को “भारत–मध्य एशिया संबंधों की नई दिशा” बताया। आभार ज्ञापन डॉ. मनीष कुमार मिश्रा एवं प्रो. परवीन कुमार ने किया।
यह अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद भारत और मध्य एशिया की साझी सांस्कृतिक धरोहर को सामने लाने वाला रहा। भाषा, साहित्य, संगीत, स्थापत्य और कूटनीति जैसे विविध पहलुओं पर हुए संवाद ने भविष्य के सहयोग और शोध की संभावनाओं को नई दिशा प्रदान की। इस आयोजन के साथ ही के एम अग्रवाल महाविद्यालय का हिन्दी महोत्सव 2025 कार्यक्रम संपन्न हुआ।
रविवार, 31 अगस्त 2025
गुरुवार, 28 अगस्त 2025
ताशकंद: एक शहर रहमतों का
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा को उज़्बेकिस्तान की स्मृतियों पर केंद्रित उनके कविता संग्रह "ताशकंद एक शहर रहमतों का" के प्रकाशन के लिए बधाई । हर कविता का जन्म किसी न किसी गहरे जीवनानुभव से जुड़ा होता है। कवि जब अपने जीवन की ठोस अनुभूतियों, संवेदनाओं और स्मृतियों को भाषा देता है, तभी वे काव्य की शक्ल ले पाती हैं। प्रस्तुत कविता–संग्रह “ताशकंद – एक शहर रहमतों का” इस सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है। यह संग्रह केवल कविताओं का संचय भर नहीं है, बल्कि एक जीवंत यात्रा–वृत्तांत सा है, जहाँ अनुभव, आत्मीयता, प्रेम, स्नेह और सांस्कृतिक संवाद एकाकार होकर इन कविताओं की शक्ल में ढल गए हैं।
ताशकंद, मध्य एशिया का एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगर, अनेक साम्राज्यों का साक्षी । सोवियत और उत्तर–सोवियत परिवर्तनों से गुजरे हुए इस नगर में कवि ने लगभग डेढ़ वर्ष बिताए। उस अवधि में उन्होंने न केवल ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज विश्वविद्यालय में हिन्दी का अध्यापन किया, बल्कि उज़्बेकी समाज, संस्कृति और वातावरण को आत्मसात भी किया। अब कवि के लिए ताशकंद केवल एक नगर नहीं रहा, बल्कि वह उनके लिए स्मृति, आत्मीयता, जीवन–अनुभव और रचनात्मक प्रेरणा का स्रोत बन गया है। यही कारण है कि इस संग्रह की प्रत्येक कविता में एक आत्मीय स्वर सुनाई देता है। कहीं लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति है, कहीं नवरोज़ का उल्लास; कहीं बर्फ़ की झरती परतों में प्रेम का दार्शनिक अर्थ उद्घाटित होता है तो कहीं समसा और चायखाना सभ्यताओं के मेल का प्रतीक बन जाते हैं।
Two days online international Conference
International Institute of Central Asian Studies (IICAS), Samarkand, Uzbekistan
(by UNESCO Silk Road Programme )
Alfraganus University, Tashkent, Uzbekistan
and
Hindi Department, K.M.Agarwal Arts, Commerce and Science College, Kalyan (West)
jointly organising
Two Day Online International Conference
*Central Asia: Literary, Cultural Scenario and Hindi*
(Date : *Saturday-Sunday 20-21 September, 2025)*
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गुरुवार, 3 जुलाई 2025
दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद निम्न मध्यवर्गीय भारतीय समाज और अमरकांत का साहित्य (जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में )
दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद
निम्न मध्यवर्गीय भारतीय समाज और अमरकांत का साहित्य
(जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में )
दिनांक : 16-17 जनवरी 2026
प्रस्तावना :
हिंदी कथा-साहित्य में यथार्थवाद की सशक्त परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कथाकारों में अमरकांत एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने निम्न मध्यवर्गीय भारतीय समाज की संवेदी बनावट, अंतर्विरोध, संघर्ष और मूल्यगत विघटन को सघनता और ईमानदार दृष्टि से प्रस्तुत किया। उनके पात्र कोई 'विशिष्ट' या 'विलक्षण' व्यक्ति नहीं, बल्कि वही सामान्य जन हैं जो भारत की सड़कों, गलियों, मोहल्लों, चाय की दुकानों और सरकारी दफ्तरों में जीते हैं — थकते हैं, लड़ते हैं, हारते हैं और फिर उठते हैं।
अमरकांत की कहानियाँ— जैसे “दोपहर का भोजन”, “जिंदगी और जोंक”, “हत्यारे” आदि — भारतीय समाज के उस वर्ग की प्रतीकात्मक जीवन-गाथाएँ हैं जिन्हें न तो साहित्य में पर्याप्त स्थान मिला और न ही सामाजिक विमर्श में कोई खास आवाज। यह वर्ग आर्थिक रूप से सीमित, सांस्कृतिक रूप से जूझता हुआ और नैतिकता के संकट से घिरा हुआ है, परंतु फिर भी संवेदना, श्रम और स्वाभिमान के बल पर अपने जीवन को जीने की कोशिश करता है। अमरकांत ने इसी वर्ग के भीतर की अदृश्य वेदना और प्रतिरोध को अपनी लेखनी से उजागर किया।
इस दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का उद्देश्य है :
· अमरकांत की साहित्यिक दृष्टि को सामाजिक संरचना के परिप्रेक्ष्य में समझना ।
· निम्न मध्यवर्गीय भारतीय समाज की समस्याओं और चेतना का गहन विश्लेषण करना ।
· यह जानना कि वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अमरकांत का साहित्य कितना प्रासंगिक और मार्गदर्शक है।
आज जब भारत तेज़ी से आर्थिक वर्गों के पुनर्गठन और शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है, तब यह अत्यंत आवश्यक है कि हम उस साहित्य को पुनर्पाठ करें जो भारतीय समाज की बुनियादी परतों को उजागर करता है — नारेबाज़ी से दूर, आत्मा के निकट। इस परिसंवाद में देशभर के साहित्यकार, आलोचक, समाजशास्त्री, शोधार्थी और हिंदीप्रेमी अमरकांत के साहित्य और उनके समाज दृष्टिकोण पर विचार-विमर्श करेंगे। यह न केवल अमरकांत को शताब्दी वर्ष की श्रद्धांजलि होगी, बल्कि हिंदी साहित्य को सामाजिक नीतियों और मानवीय दृष्टिकोण से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास भी।
आलेख लिखने हेतु उप विषय :
- अमरकांत की कहानियों में निम्न मध्यवर्गीय मनोविज्ञान
- ‘जिंदगी और जोंक’ और 'हत्यारे' जैसे पात्रों के माध्यम से सामाजिक अन्याय की पड़ताल
- आर्थिक संकट और नैतिक द्वंद्व: अमरकांत के पात्रों की आंतरिक संघर्ष गाथा
- अमरकांत और प्रेमचंद: यथार्थवादी परंपरा का विकास
- नारी और निम्न मध्यवर्ग: अमरकांत की कहानियों में स्त्री संवेदना
- शहरीकरण, बेरोजगारी और विस्थापन का चित्रण
- अमरकांत की दृष्टि में सांप्रदायिकता और सामाजिक तटस्थता
- हिंदी कथा साहित्य में 'सामान्यजन' का उद्भव: अमरकांत के संदर्भ में
- विकास और मूल्यहीनता के बीच फंसा समाज: अमरकांत की दृष्टि से
- वर्तमान कहानी लेखन में अमरकांत की छाया और प्रभाव
- कहानी में भाषा और शैली: अमरकांत की सहजता और कथ्य की प्रामाणिकता
- हाशिए के लोग, हाशिए की भाषा: अमरकांत और सामाजिक समरसता
- नवउदारवादी समय में अमरकांत का साहित्यिक प्रतिरोध
- पत्रकारिता से साहित्य तक: अमरकांत की वैचारिक यात्रा
- अमरकांत की कहानियों का दृश्यात्मक विश्लेषण: रंगमंच और फिल्म संभावनाएं
- “निम्न मध्यवर्गीय भारतीय समाज और अमरकांत का साहित्य”
- नारी और निम्न मध्यवर्ग: अमरकांत की कहानियों में स्त्री संवेदना
- शहरीकरण, बेरोजगारी और विस्थापन का चित्रण
- अमरकांत की दृष्टि में सांप्रदायिकता और सामाजिक तटस्थता
- हिंदी कथा साहित्य में 'सामान्यजन' का उद्भव: अमरकांत के संदर्भ में
- विकास और मूल्यहीनता के बीच फंसा समाज: अमरकांत की दृष्टि से
- वर्तमान कहानी लेखन में अमरकांत की छाया और प्रभाव
- कहानी में भाषा और शैली: अमरकांत की सहजता और कथ्य की प्रामाणिकता
- हाशिए के लोग, हाशिए की भाषा: अमरकांत और सामाजिक समरसता
- अमरकांत की कहानियाँ
- अमरकांत के उपन्यास
- अमरकांत का बाल साहित्य
अमरकांत : जन्म शताब्दी वर्ष
अमरकांत
: जन्म शताब्दी वर्ष
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
प्रभारी – हिन्दी विभाग
के एम अग्रवाल कॉलेज , कल्याण पश्चिम
महाराष्ट्र
उत्तर प्रदेश के सबसे पूर्वी जिले
बलिया में एक तहसील है - ‘रसड़ा’। इस रसड़ा तहसील के सुपरिचित गाँव ‘नगरा’ से सटा हुआ
एक छोटा सा गाँव और है। यह गाँव है - ‘भगमलपुर’। देखने में यह गाँव नगरा गाँव का
टोला लगता है।भगमलपुर गाँव तीन टोलों में बँटा है। उत्तर दिशा की तरफ का टोला
यादवों (अहीरों) का टोला है तो दक्षिण में दलितों का टोला (चमरटोली)। इन दोनों
टोलों के ठीक बीच में कायस्थों के तीन परिवार थे। ये तीनों घर एक ही कायस्थ पूर्वज
से संबद्ध, कालांतर में तीन टुकड़ों में विभक्त होकर वहीं रह रहे थे।
इन्हीं कायस्थ
परिवारों में से एक परिवार था सीताराम वर्मा व अनन्ती देवी का। इन्हीं के पुत्र के
रूप में 1 जुलाई 1925 को अमरकांत का जन्म हुआ। अमरकांत का नाम श्रीराम
रखा गया। इनके खानदान में लोग अपने नाम के साथ ‘लाल’ लगाते थे। अतः अमरकांत का भी
नाम ‘श्रीराम लाल’ हो गया। बचपन में ही किसी साधू-महात्मा द्वारा अमरकांत का एक और
नाम रखा गया था। वह नाम था - ‘अमरनाथ’। यह नाम अधिक प्रचलित तो ना हो सका, किंतु स्वयं श्रीराम
लाल को इस नाम के प्रति आसक्ति हो गयी। इसलिए उन्होंने कुछ परिवर्तन करके अपना नाम
‘अमरकांत’ रख लिया। उनकी साहित्यिक कृतियाँ इसी नाम से प्रसिद्ध हुई।
सन 1946 ई. में अमरकांत ने बलिया के सतीशचन्द्र इन्टर कॉलेज से
इन्टरमीडियेट की पढ़ाई पूरी की और बाद में बी.ए. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से करने
लगे। बी.ए. करने के बाद अमरकांत ने पढ़ाई बंद कर नौकरी की तलाश शुरू कर दी। कोई
सरकारी नौकरी करने के बदले उन्होंने पत्रकार बनने का निश्चय कर लिया था। उनके अंदर
यह विश्वास बैठ गया था कि हिंदी सेवा पर्याय है देश सेवा का। वैसे अमरकांत के मन
में राजनीति के प्रति एक तरह का निराशा का भाव भी आ गया था। यह भी एक कारण था
जिसकी वजह से अमरकांत पत्रकारिता की तरफ मुडे़। अमरकांत के चाचा उन दिनों आगरा में
रहते थे। उन्हीं के प्रयास से दैनिक ‘सैनिक’ में अमरकांत को नौकरी मिल गयी। इस तरह
अमरकांत के शिक्षा ग्रहण करने का क्रम समाप्त हुआ और नौकरी का क्रम प्रारंभ हुआ।
अमरकांत का रचनात्मक जीवन अपनी पूरी गंभीरता के साथ प्रारंभ हुआ। जिन
साहित्यकारों को अब तक वे पढ़ते थे या अपने कल्पना लोक में देखते थे उन्हीं के बीच
स्वयं को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए। पत्र-पत्रिकाओं में नौकरी का क्रम भी प्रारंभ
हो गया था। लेकिन सन 1954 में अमरकांत हृदय रोग के कारण बीमार पड़े और नौकरी छोड़कर
लखनऊ चले गये। एक बार फिर निराशा ने उन्हें घेर लिया। अब उन्हें अपने जीवन से कोई
उम्मीद नहीं रही। पर लिखने की आग कहीं न कहीं अंदर दबी हुई थी अतः उन्होनें लिखना
प्रारंभ किया और उनका यह कार्य आज भी जारी है।
अमरकांत अपने समय और उसमें घटित होने वाले हर महत्वपूर्ण परिवर्तन से जुड़े
रहे। उन्होंने जो देखा, समझा और जो सोचा उसी को अपनी कहानियों के
माध्यम से प्रस्तुत किया। उनकी कहानियाँ एक तरह से ‘दायित्वबोध’ की कहानियाँ कही
जा सकती हैं। यह ‘दायित्वबोध’ ही उन्हें प्रेमचंद की परंपरा से भी जोड़ता है।
अमरकांत ने अपने जीवन और वातावरण को जोड़कर ही अपने कथाकार व्यक्तित्व की रचना की
है। अमरकांत अपने समकालीन कहानीकारों से अलग होते हुए भी प्रतिभा के मामले में
कहीं भी कम नहीं हैं। उनका व्यक्तित्व किसी भी प्रकार की नकल से नहीं उपजा है।
उन्होंने जिन परिस्थितियों में अपना जीवन जिया उसी से उनका व्यक्तित्व बनता चला
गया। और उन्होंने जीवन में जो भी किया उसी को पूरी ईमानदारी से अपने लेखन के
माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयत्न भी किया। इसलिए अमरकांत के व्यक्तित्व को
निर्मित करने वाले घटक तत्वों पर विचार करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि
उनका व्यक्तित्व आरंभ से लेकर अब तक एक ऊर्ध्वगामी प्रक्रिया का परिणाम है।
उन्होंने अपने व्यक्तित्व को किसी निश्चित योजना अथवा आग्रह के आधार पर विकसित न
करके जीवन के व्यावहारिक अनुभव द्वारा आकारित किया। सारांशतः उनका व्यक्तित्व
अनुभव सिद्ध व्यक्ति का व्यावहारिक संगठन है। यही कारण है कि उनमें आत्मनिर्णय, आत्मविश्वास और आत्माभिमान का चरम
उत्कर्ष दिखायी पड़ता है।
अमरकांत
अपने ऊपर प्रेमचन्द और अन्य साहित्यकारों का भी प्रभाव स्वीकार करते हैं। उन दिनों
अमरकांत के पास सभी साहित्य उपलब्ध नहीं होता था। जो पढ़ने को मिलता उन्हीं का
प्रभाव भी पड़ना स्वाभाविक था। उन दिनों शरतचन्द्र और रवीन्द्रनाथ टैगोर का साहित्य
उनके लिए उपलब्ध था। घर पर आने वाले ‘चलता पुस्तकालय’ के माध्यम से ही अधिकांश
साहित्य उन्हें पढ़ने को मिला था। इन दोनों की ही कहानियों में रोमांटिक तत्व था
जिसने अमरकांत को प्रभावित किया।आगे चलकर जब अमरकांत का परिचय प्रेमचंद, अज्ञेय, जैनेन्द्र, इलाचंद जोशी और विश्वसाहित्य से हुआ तो उनके अंदर एक दूसरे तरह की
समझ विकसित हुई। रोमांस और आदर्श का प्रभाव उनके ऊपर से कम होने लगा। वैसे इस
रोमांस और आदर्श से दूर होने का एक कारण अमरकांत विभाजन के दम पर मिली आज़ादी और
उसके बाद हुए भीषण कत्ले आम को भी मानते हैं। अभी तक सभी का उद्देश्य एक ही था और
वह था देश की आज़ादी। लेकिन पद, पैसा
और प्रतिष्ठा के लालच में लोग अब विभाजन की बात करने लगे थे। इससे आदर्शो के प्रति
जो एक भावात्मक जुड़ाव था उसे गहरा धक्का लगा।
जयप्रकाश
नारायण के कांग्रेस पार्टी से अलग होने की बात सुनकर भी अमरकांत को आघात पहुँचा।
गोर्की, मोपासा, टॉलस्टॉय, चेखव, दास्टायवस्की, रोम्यारोला, तुर्गनेव, हार्डी, डिकेन्स जैसे लेखकों के साहित्य नें अमरकांत को
प्रभावित किया। बी.ए. करने के बाद अमरकांत नौकरी करने आगरा चले आये। यहाँ वे
प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े और कई साहित्यकारों से परिचित भी हुए। आगरा के बाद
अमरकांत इलाहाबाद चले आये। यहाँ के भी प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े। इलाहाबाद आने
और यहाँ के प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने से अमरकांत के साहित्यिक संस्कार अधिक
पुष्ट हुए। लेखकीय आत्मविश्वास में भी वृद्धि हुई। प्रगतिशील लेखक संघ के लेखकों
के साथ विचार विनिमय का भी उनकी रचनाशीलता पर प्रभाव पड़ा। उनकी ग्रहणशीलता का यह
वैशिष्ट्या था कि लेखकों के रचनात्मक गुणों को वे आदरपूर्वक स्वीकार करते थे। यह
भी लक्षणीय है कि जहाँ उन्होंने अपने समान धर्माओं से प्रभाव ग्रहण किया वहीं
उन्हें प्रभावित भी किया। मोहन राकेश, रांगेय राघव, राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह, कमलेश्वर, केदार, राजनाथ पाण्डेय, मधुरेश, मन्नू भंडारी,
मार्कण्डेय, शेखर जोशी, भैरव प्रसाद गुप्त, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, श्रीकांत वर्मा, ज्ञान प्रकाश, सुरेन्द्र वर्मा, विजय चौहान और विश्वनाथ भटेले जैसे कई
साहित्यकारों ने अगर अपना प्रभाव अमरकांत पर डाला तो वे भी अमरकांत के साहित्यिक
प्रभाव से बच नहीं पाये। समय-समय पर इन सभी ने अमरकांत के साहित्य पर अपनी
समीक्षात्मक दृष्टि प्रस्तुत की है।
अमरकांत
के प्रकाशित कहानी
संग्रह हैं - जिंदगी और जोक, देश के लोग, मौत का नगर, मित्र मिलन, कुहासा, तूफान, कला प्रेमी, जांच
और बच्चे और प्रतिनिधि कहानियाँ । आप
के प्रकाशित उपन्यासों में – सूखा पत्ता, कटीली राह
के फूल, इन्हीं हथियारों से, विदा की
रात, सुन्नर पांडे की पतोह, काले उजले
दिन, सुखजीवी, ग्रामसेविका इत्यादि
प्रमुख हैं । अमरकांत को जो प्रमुख पुरस्कार एवम् सम्मान मिले, वे इसप्रकार हैं :-
सोवियतलैंड नेहरू पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, यशपाल
पुरस्कार, जन-संस्कृति सम्मान, मध्यप्रदेश
का ‘अमरकांत कीर्ति’ सम्मान, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के
हिंदी विभाग का सम्मान । उनके उपन्यास इन्हीं हाथों से के लिए उन्हें 2007
में साहित्य अकादमी पुरस्कार और वर्ष 2009
में व्यास सम्मान मिला। उन्हें वर्ष 2009 के
लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सोमवार दिनांक 17 फ़रवरी, 2014 को अमरकांत का इलाहाबाद में
निधन हो गया । अमरकांत हमारे समय
का वह ‘किरदार’ हैं, जो पाठ्यक्रम में छपकर खत्म नहीं होता,
बल्कि हर समय की दीवार पर
एक चुप्पी बनकर टंगा रहता है। उनकी कहानियाँ कोई साहित्यिक कारनामा नहीं,
बल्कि सामूहिक चेतना की
दस्तावेज़ हैं। शताब्दी वर्ष में उन्हें याद करना सिर्फ
अतीत का पुनरावलोकन नहीं, वर्तमान को उसकी असहज
सच्चाइयों के साथ देख पाने की शक्ति अर्जित करना है।

















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